सरकार और भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) अब भी इस बात को लेकर सतर्क हैं कि बड़े कॉरपोरेट्स को बैंकिंग सेक्टर में खुली छूट न दी जाए। नियमों की समीक्षा जरूर हो रही है, लेकिन आत्म-हित में कर्ज देने यानी “सेल्फ लेंडिंग” की चिंता आज भी बनी हुई है — और यही कारण है कि बैंकिंग में कॉरपोरेट नियंत्रण पर रोक कायम है।
26% से ज्यादा हिस्सेदारी पर रोक
सरकार की स्पष्ट नीति है कि कोई भी कॉरपोरेट किसी बैंक में 26% से अधिक हिस्सेदारी नहीं रख सकता। इससे यह सुनिश्चित किया जा सके कि कोई भी कारोबारी समूह अपने ही कंपनियों को कर्ज न दे सके। यह वही समस्या है, जिसकी वजह से 1969 में बैंकों का राष्ट्रीयकरण किया गया था।
NBFCs को भी नियमों का पालन जरूरी
हालांकि Tata Capital और Bajaj Finance जैसे कुछ गैर-बैंकिंग वित्तीय संस्थान (NBFCs) अपने संचालन और जोखिम प्रबंधन में काफी मज़बूत माने जाते हैं, फिर भी उन्हें बैंक बनने के लिए इन्हीं नियमों का पालन करना होगा। यानी उनके लिए भी हिस्सेदारी की सीमा 26% ही रहेगी।
RBI कर रहा है नियमों की समीक्षा, लेकिन बदलाव की जल्दी नहीं
RBI के मुताबिक, बैंकिंग गवर्नेंस और प्रमोटर ओनरशिप पर नियमों की समीक्षा की जा रही है, लेकिन इसका यह मतलब नहीं कि जल्द कोई ढील दी जाएगी।
Tata Capital और Bajaj Finance की स्थिति
फिलहाल इन दोनों NBFCs ने बैंक बनने के लिए औपचारिक आवेदन नहीं किया है। लेकिन Tata Capital द्वारा IPO फाइल करने और कंपनी की संरचना में बदलाव से संकेत जरूर मिल रहे हैं कि भविष्य में यह संभावना हो सकती है।

विदेशी निवेशकों की भी रुचि
जैसे एक विदेशी कंपनी ने हाल ही में एक प्राइवेट बैंक में हिस्सेदारी ली है, वैसे ही कई विदेशी संस्थान भी भारतीय बैंकिंग सेक्टर में निवेश को लेकर इच्छुक हैं। लेकिन इनके लिए भी वही नियम लागू होंगे — 26% हिस्सेदारी की सीमा सब पर बराबर।
क्या कॉरपोरेट्स को बैंक खोलने देना चाहिए?
सरकार की सोच साफ है — मौजूदा सिस्टम में ऐसे मजबूत सेफ्टी फीचर्स नहीं हैं, जो यह सुनिश्चित कर सकें कि कॉरपोरेट्स अपने बैंकों का गलत इस्तेमाल नहीं करेंगे। कागजों पर भले ही नियम हों कि प्रमोटर अपनी ही कंपनियों को लोन नहीं दे सकते, लेकिन व्यवहार में इन्हें नजरअंदाज करना आसान हो सकता है — और यही एक बड़ी चिंता है।


