अब दुकानदार या ब्रांड MRP के नाम पर मनमानी नहीं कर पाएंगे। सरकार एक नया सिस्टम लाने की तैयारी में है, जिसमें यह साफ किया जाएगा कि किसी प्रोडक्ट की अधिकतम खुदरा कीमत (MRP) आखिर तय कैसे की जाती है।
छूट के नाम पर भ्रम फैला रही कंपनियां!
अक्सर ऐसा होता है कि कोई सामान जिसकी MRP ₹5,000 होती है, वो बाजार में ₹2,500 में मिल जाता है। अब सवाल उठता है—अगर ₹2,500 में भी मुनाफा हो रहा है, तो असली कीमत क्या थी? और फिर ₹5,000 लिखने की क्या जरूरत थी?
यही गड़बड़ी रोकने के लिए केंद्र सरकार MRP तय करने का एक फॉर्मूला लाने की सोच रही है।
क्या बदलाव होंगे?
सरकार चाहती है कि MRP निर्माण लागत और मार्केटिंग खर्च के आधार पर तय हो।
पहले जरूरी चीजों और रोजमर्रा की इस्तेमाल की चीजों पर ये नियम लागू किया जा सकता है।
इसके लिए सरकार उद्योग जगत, उपभोक्ता संगठनों और टैक्स अधिकारियों से बातचीत कर रही है।

अभी क्या होता है?
अभी कंपनियां किसी भी प्रोडक्ट की MRP मनचाहे तरीके से तय कर सकती हैं। उन्हें ये नहीं बताना पड़ता कि इसमें क्या खर्च आया और कितना मुनाफा रखा गया। इसी वजह से लोग “50% डिस्काउंट” जैसी स्कीम में उलझ जाते हैं, जबकि असल में वो कीमत ही गलत होती है।
नया फॉर्मूला क्या करेगा?

सरकार कीमतों पर कोई कंट्रोल नहीं करना चाहती, लेकिन इतना जरूर चाहती है कि MRP तय करने का कोई पारदर्शी सिस्टम हो। ताकि कंपनियां छूट के नाम पर उपभोक्ताओं को गुमराह न कर सकें।
MRP पर अभी क्या कानून है?
अभी MRP से जुड़े मामलों पर मेट्रोलॉजी एक्ट, 2009 के तहत कार्रवाई होती है, लेकिन यह कानून यह नहीं बताता कि कीमत कैसे तय हो। GST आने के बाद अब टैक्स भी MRP पर नहीं, बल्कि रियल ट्रांजैक्शन वैल्यू पर लगता है, जिससे कंपनियों को और भी आजादी मिल गई है।
क्या कहते हैं एक्सपर्ट?
विशेषज्ञों का कहना है कि MRP को पारदर्शी बनाने के लिए जरूरी है कि पहले से मौजूद संस्थाओं जैसे प्रतिस्पर्धा आयोग और GST सिस्टम को मजबूत किया जाए। उधर कंपनियों का कहना है कि दवाओं जैसे जरूरी प्रोडक्ट्स को छोड़कर बाकी चीजों पर दखल देना बाजार की आज़ादी को नुकसान पहुंचा सकता है।


