भारतीय परिवारों की वित्तीय आदतों में एक बड़ा बदलाव देखने को मिल रहा है। जहां पहले बचत को प्राथमिकता दी जाती थी, वहीं अब कर्ज लेने की प्रवृत्ति तेजी से बढ़ रही है। यह बदलाव केवल व्यक्तिगत जरूरतों तक सीमित नहीं है, बल्कि सामाजिक और उपभोक्तावादी सोच का असर भी साफ दिखाई देता है।
घटती बचत, बढ़ता कर्जभारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के हालिया आंकड़े बताते हैं कि देश में घरेलू बचत लगातार तीसरे साल घटी है। 2023 में शुद्ध घरेलू बचत जीडीपी के केवल 5.3% पर आ गई, जो बीते 47 वर्षों का सबसे निचला स्तर है। वहीं, घरेलू कर्ज जीडीपी के मुकाबले 41.9% तक पहुंच चुका है, जबकि एक दशक पहले यह आंकड़ा 26% था।
सरकारी बैंकों से बढ़ा भरोसा, लेकिन कर्ज का बोझ भी बढ़ाजून 2024 के आंकड़े दर्शाते हैं कि होम लोन के मामले में सार्वजनिक बैंकों की हिस्सेदारी 2% रही, जबकि निजी बैंक 0.9% पर सिमट गए। एजुकेशन लोन और क्रेडिट कार्ड ऋण जैसे क्षेत्रों में भी सरकारी बैंकों का वर्चस्व बना हुआ है। शिक्षा ऋण में सार्वजनिक बैंकों की हिस्सेदारी 3.6% है, जबकि निजी बैंकों की केवल 2%।
खपत के लिए बढ़ रही उधारी
घरेलू कर्ज के स्वरूप में भी बदलाव आया है। बैंकों द्वारा दिया गया कुल ऋण अब कृषि और उद्योग क्षेत्र की तुलना में अधिकतर व्यक्तिगत जरूरतों के लिए दिया जा रहा है। कुल बैंक कर्ज में 32.7% हिस्सा अब पर्सनल लोन का है। वर्ष 2013-14 से अब तक इसमें दोगुनी बढ़ोतरी दर्ज की गई है।इस बढ़ते उधारी ट्रेंड का एक अहम पहलू यह भी है कि 54.9% घरेलू कर्ज अब नॉन-हाउसिंग रिटेल लोन (जैसे क्रेडिट कार्ड, गोल्ड लोन) के रूप में लिया जा रहा है। यानी यह राशि घर बनाने जैसी जरूरतों की बजाय खपत और विलासिता पर खर्च हो रही है।
चाहत’ बनाम ‘जरूरत’: बदलती मानसिकताआज के समय में कर्ज लेने की मानसिकता सिर्फ जरूरत तक सीमित नहीं है। ब्रांडेड सामान, शादी-ब्याह, निजी इलाज और जीवनशैली से जुड़ी अन्य चीजों के लिए भी लोग ऋण लेने से नहीं हिचकिचा रहे हैं। यह प्रवृत्ति समाज में ‘इंस्टेंट ग्रैटिफिकेशन’ की भावना को दर्शाती है, जहां लोग वर्तमान सुख को भविष्य की स्थिरता से ऊपर रख रहे हैं।

क्या है आगे की राह?हालांकि सरकार द्वारा ब्याज दरों में कटौती, ग्रामीण आय में सुधार और टैक्स छूट जैसी पहलें कुछ राहत दे सकती हैं, लेकिन यदि यह ऋण प्रवृत्ति “चाहत” की दिशा में यूं ही बढ़ती रही तो भविष्य में यह एक गंभीर आर्थिक संकट का कारण बन सकती है।बचत और उधारी के बीच संतुलन बनाना अब केवल व्यक्तिगत जरूरत नहीं, बल्कि समग्र आर्थिक स्वास्थ्य के लिए भी ज़रूरी हो गया है।


